इश्क है रब की इबादत ये क्या किया तुमने
अपने हाथों को लहू से क्यूँ रंग दिया तुमने
जब नहीं पाए समझ;कान्हा, गोपियों को तुम
बांसुरी को क्यूँ अधर अपने रख लिया तुमने
हँस के मीरा ने पिया था क्यूँ जहर जाने बिना
कान्हा को करने को बदनाम बिष पिया तुमने
खार बन करना हिफाजत था तुम्हे जिस गुल की
उस हंसी गुल को ही लहू से भिगो दिया तुमने !
जिसके घावों को था बस प्यार का मरहम चाहिए
उसके जख्मों कोखारों से ही क्यूँ सिया तुमने
जो ना जी सकता था दो घड़ियाँ भी तुम्हारे बिन
"आशु" हर लम्हा बिना उसके क्यूँ जिया तुमने
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र दो कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान,गोंडा,उत्तरप्रदेश.
मोबाइल न० 9839167801
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