JO DIN NE KAHA

Friday, 31 May 2013

बहुत शर्मसार हूँ मैं

बहुत शर्मसार हूँ मैं
बचपन में
रेत में बनाकर मंदिर
मैं झुकाता था सर
और भूले से भी मंदिर पे रख गया
किसी का पाँव
या मंदिर के लिए उपयुक्त कोई मजाकिया शब्द
भी आक्रोश से भर देता था मुझे
कागज़ पे मेरे द्वारा उकेरे
मेरे इस्ट के भाव चित्र पर
किसी का कोई और रंग भर देना
व्यथित कर देता था मुझे
मैं अक्सर उकेरता था
लकड़ियों और पत्थरों पर भगवान्
और बर्दास्त से बाहर थी
मेरी कल्पना में रची, दिल में बसी
किसी भी रचना से तनिक भी छेडछाड ...........
यूं ही होते होते बड़े
कभी किसी नेता, कभी अभिनेता
कभी खिलाड़ी, कभी अनाडी
संगीतकार, गीतकार
माँ- बाप, रिश्तेदार
अग्रजों, अनुजों
संतों, महात्माओं शिक्षकों
और भी ना जाने कितनी
ह्रदय पर प्रतिबिंबित तस्वीरों को
मैंने स्थापित कर लिया था
एक आदर्श मूर्ती के रूप में
इस ह्रदय में ..................
मगर बचपन के घरोंदों की ही तरह
कभी अनजाने, कभी जानकर
कभी प्रमाद् वश, कभी चिढाने के लिए
तोड़ने की कोशिस की गयी इन हृद्यंकित प्रतिमाओं को
तमाम कसमों , तमाम सबूतों का वास्ता देकर
मुझे सत्य से रूबरू कराया
और अंततः तोड़ ही दी गयीं
ये आदर्श प्रतिमाएं
और मैं आक्रोशित और व्यथित भी हुआ
बचपन की मानिंद ही ................
 कुछ प्रतिमाएं टुकड़ों- टुकड़ों में बंट गयीं
कुछ के अंग भंग हुए
कुछ पर गहरे घाव थे
और जिस पर सिर्फ हलके निशान थे
वो थी शिक्षक की प्रतिमा
मैंने उसे गले लगा लिया
शिक्षण को अपना जीवन यापन बना लिया
पर वक़्त के कोहरे में आँखों के सामने
धुंधला छाया
मेरे भी कदम डगमगाए
समाज की मजबूत नीव रखने की जिम्मेवारी से
इतिश्री करके
मैंने अपनी नीव मजबूती के इरादे बनाये
शिक्षण से जुड़े ठेकेदारों में पैठ बनाई
हर साक्षात्कार समिति से चयन समिति तक
अपने नाम की चर्चा छाई
प्रश्नपत्र बनवाने से लेकर
प्रश्नपत्र जंचवाने तक कोई कसर न छोडी
घर से आफिस और आफिस से घर जाते हमेशा ही
गाडी आला अफसर के कार्यालय या घर को  मोड़ी
बच्चों  को मिठाई नहीं खिलाई
पर हर आला अफसर बाबू चपरासी के घर जरूर भिजबाई
पर एक दिन जैसे ही एक
ठेकेदारों के अनुरूप निरीक्षण रिपोर्ट बनाने पर
नोटों की गडडी का तोहफा लेने को हाथ बढ़ाया
बूढ़े की शक्ल में एक प्रकाश पुंज सामने आया
आते ही चिल्लाया
बड़ी आदर्श की प्रतिमाएं बनाता था
नेता, अभिनेता शिक्षक सबमे आदर्श नजर आता था
प्रतिमाओं के टूटने पर बड़ा चिल्लाता था
याद कर जब अपने शिक्षक की बिधि से
तेरा कंपाउंड नहीं बन पाया था
तूने कितना मजाक उड़ाया था 
याद कर शिक्षकों की पार्टी की बात सुनकर
तू तिलमिलाया  था
शिक्षक ने मान्यता दिलाने के लिए सौदा कर डाला सुनकर
कितना बडबडाया था
आज शोधार्थी तुझ पर भी बडबडा रहा है
तेरे बिधियों से वो भी शोध नहीं कर पा रहा है
अब तू भी शाम को जश्न में सरीक हो जाएगा
फिर किसी शोधार्थी का फोन आएगा
तू जानता है पेपर के बिषय में तू कुछ नहीं समझा पायेगा
तो व्यस्तता दिखाकर और बड़ा हो जाएगा
लेकिन एक समय तक इंतज़ार करके
वो शोधार्थी भी तेरे ही तरह किसी रस्ते
पहाडी पर चढ़ जाएगा
तुझे आवाज देगा
पहाडी से पहाडी का रिश्ता पास लाएगा
तू  उसे पहाडी पे जीने का रास्ता बताएगा
लेकिन सम्भ्ब्तः वो कुछ जमीनी सवाल उठाएगा
हो सकता है तब तू नजर नहीं मिला पायेगा
क्योंकि उसकी आँखों में अभी नमी है
पर तेरी आँखों में अब पानी बिलकुल नहीं है
तेरी आँखों में उसे कुछ नजर नहीं आएगा
वो उतरेगा तो कीचड में धंस जाएगा
तू भी आज सौदा करके आया है
रंगरेलियां मनायेगा
लिफाफा तेरे परिवार के लिए खुशियाँ खरीद लाएगा
पर ध्यान से सुन
अर्जुन बनकर तो आज का युद्ध नहीं लड़ पायेगा
इसलिए बन कर कृष्ण अर्जुन का रथ चला
शिक्षको में सोया कृष्ण जगा
छात्र के रूप में हजारों भ्रमित अर्जुन खड़े है उन्हें जगा
उन्हें उकसा, गांडीव उठवा
जब सारे शिक्षक कृष्ण रूप में रथ चलाएंगे
जब सारे अर्जुन गांडीव उठाएंगे
तभी महाभारत समर की तरह भारत समर जीता जाएगा
आने वाले पीढी को जीते जी लाश मत बना
उनकी लाश पे चढ़ अपनी तरक्की का परचम मत फहरा
वक़्त के साथ ये रिवाज में बदल जाएगा
वरना आज तो कृष्ण भ्रमित है
फिर अर्जुन भी भ्रमित हो जाएगा
यह कहकर रश्मि पुंज अंतर्ध्यान हो गया
जाते जाते मेरी औकात समझा गया
आइना दिखा गया
मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही है
मुझे लगता है मैं धरती पर भार हूँ
आज मैं बहुत शर्मसार हूँ

डॉ आशुतोष मिश्र आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा , उत्तरप्रदेश
९८३९१६७८०१




2 comments:

  1. hard hitting ...true...where are we heading ?
    what is our contribution in uplifting the profession of pharmacy....or are we the main cause of downfall...??????

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  2. मेरी कविता के बिश्लेषण के लिए हार्दिक धन्यवाद

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