सिगरेट के पहले काश के साथ ही
आयी थी तीब्र खांसी
और
शराब के पहले घूँट से
उत्पन्न घृणा के द्वारा
रोका था तुमने मुझे
किन्तु
अहम् वश मैं
जलाता रहा सिगरेट पे सिगरेट
बनाता रहा पैग पे पैग
किन्तु अब
नशे के समुद्र में डूबते हुए
याद आ रहे हैं मुझे
सिन्धु पर सेतु बनाने के प्रयास में
डूबे उन पत्थरों की
जिन पर अंकित नहीं था
तुम्हारा नाम
और याद आ रहे हैं वो भी
जिन्हें तेरा रहे थे नल-नील
तुम्हारे नाम के साथ
अब कोई नल-नील नहीं
जो अंकित कर दे तुम्हारा नाम
मेरे ह्रदय पाषण पर
अब बिराजित होना होगा
तुम्हे स्वयं मेरे अंतर में
और बचाना होगा मुझे डूबने से
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801
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