JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

मानवता


आज मानवता रो  रही है
निकल कर दिलों से
अँधेरे बीरानों में सो रही है
मानवता तो बस 
शब्दकोष का शब्द रह गयी है
ढूढ़ रहा है हर कोई
न जाने कहाँ खो गयी है
किसी ने बताया 
मानवता बहाँ  रह रही है
पहुंचा तो पता चला
मानवता सो रही है
मैंने खुद को धाडस बंधाया
फिर मानवता के पास आया
हाथ जोड़कर की विनती
मानवता जी आप रो रही हैं
इन वीरानों में खो रही हैं
क्या चक्र के बिना रथ पूरा हो सकता है
जिसमे आप नहीं वो मानव कैसे हो सकता है
मानवता का कंठ भर आया
अपने हाथों से मुझे सहलाया
अरे पागल
तू क्यूँ मुझे प्यार करता है
अपने दिल में जगह मेरे लिए रखता है
मेरी बांहों में मत आ
 सिमट जाएगा
क्या करेगा मानव बनकर 
तेरा अस्तित्व मिट जाएगा
क्यूंकि
ये मानवों का नहीं
दानवों का राज है
दानवता से अपनी मानवता को कैसे बचाएगा
कहाँ कहाँ पुकारेगा
कहाँ कहाँ जाएगा
दुनिया के तख़्त ताजों पे शीश झुकाएगा
वहां भी तुझे दानव नजर आएगा
तेरी मानवता फिर एक रात की मेहमान बन जायेगी
सुबह मुह दिखाने के काबिल न रह पायेगी
आज दुनिया के हर तख़्त-ओ-ताज पे दानव हैं
लेकिन फुटपाथ पे अब भी कुछ मानव हैं
ये सोचकर फुटपाथ पर चली जाती थी
लेकिन दानवों के दलालों ने 
फुटपाथ भी खरीद रखे हैं
बीच बाज़ार में
हर बार लुट जाती हूँ
इसलिए छुप कर सोती हूँ
वीरानों में रोती हूँ
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

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