कविता सुनाते ही
गूँज उठी तालियों के साथ ही
व्यथित हो उठता हूँ मैं
छ जाता है सन्नाटा
अंतःकरण में
फिर डुबाता हूँ मैं
अपने लहू में कलम
फिर जागता हूँ सारी रात
इंतज़ार करता हूँ
एक नयी कविता का..
करता रहूँगा मैं प्रयास
यूं ही अनवरत
मैं चाहता हूँ
मेरी हर कविता के बाइ द
छा जाए सदन में
मरघट सी शांति
और गूँज उठे
तालियों की गडगडाहट
मेरे अंतर में
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801
No comments:
Post a Comment