JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

तालियों की गडगडाहट


कविता सुनाते ही
गूँज उठी तालियों के साथ ही
व्यथित हो उठता हूँ मैं
जाता है सन्नाटा
अंतःकरण में
फिर डुबाता हूँ मैं
अपने लहू में कलम
फिर जागता हूँ सारी रात
इंतज़ार करता हूँ
एक नयी कविता का..
करता रहूँगा मैं प्रयास
यूं ही अनवरत
मैं चाहता हूँ
मेरी हर कविता के बाइ
छा जाए सदन में
मरघट सी शांति
और गूँज उठे
तालियों की गडगडाहट
मेरे अंतर में
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, . पर
मोबाइल नो 9839167801




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