JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

छूना चाहती थी आकाश


साहित्य के एक
उत्कृष्ट सम्मलेन में
पुज रहे थे वो
और झुक रहे थे
सैकड़ों युवा साहित्यकार
उनके चरणों में
मानवीय मूल्यों के चिंतन पर
उनकी कृति ने,
कर दिया था उन्हें लब्ध प्रतिष्ठित
टयूब लाईट की दूधिया रोशनी में
गैलरी में सजी
सैकड़ों सुन्दर किताबों में
दमक रही थी अलग
उनकी एक सुन्दर किताब
किताब की जिल्द पर छपी थी
दरिंदों  के हाथों में छटपटाती
खूबसूरत अवला के रूप में
मानवता की तस्वीर
जिल्द की ख़ूबसूरती से प्रभावित
मुड गए मेरे कदम
तीन सितारा होटल की
तीसरी मंजिल के
उनके कमरे की तरफ
और
दस्तक देते ही खुल गए
भूलवश बंद किये गए दर के पट
और सहसा ही खिसक गयी
मेरे पैरों तले की जमीन भी
कमरे के भीतर
एक अर्ध नग्न षोडशी कन्या की
नग्न पीठ पर
कहानी लिख रही थी
उस लब्ध प्रतिष्ठित कृतिकार की उंगलियाँ
वो षोडशी थी एक नवोदित साहित्य सर्जक
और छूना चाहती  थी आकाश
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, . प्र. मोबाइल नो 9839167801

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