उम्र का सैलाब रोके ना रुका
केश काले श्वेत वरनी हो गए
आधार अवलंबन ही अवलंबित स्वयं
पीत्वरनी एक रोगी की तरह
पड़ी प्रतिपल उँगलियों पे गिनती पल
मोतियों की माल बिखरी, लाल बिखरे
उँगलियों में शेस धागा एक है
संगीत के सुर कम्पनों से बिकम्पित स्वर
अनियंत्रित वाहनों की तरह कापती हाथों की लाठी
जोहता हो बात ऐसे बटोही सी
कुण्डियाँ हैं मौन दर की
अक आलीशान कोठी खंडहर सी
ढूंढती किलकारियां चुपचाप ही
गूँज के फिर गूंजती अनुगूंज
मौन बैठी आस सीने में सजोये
आँधियों से जूझती लौ की तरह
उमड़ती अन्तः में बस एक आह सी
हाय कितना वक़्त निष्ठुर हो गया है
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801
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