गुरु शिष्य परंपरा
चल रही थी,
जो एक परंपरा
एक श्रद्धामयी
और
गहन आत्मीयता की बुनियाद पर
अनादी कल से आज तक......
क्यूँ होने लगी सहसा ही
बिखंडित
छिन्न-भिन्न उसी लाश की तरह
जो बिखर जाती है
चीथड़ों और लोथड़ों में
बम के एक धमाके से...
आज निर्वाह कर रहा है
अकेला गुरु
या फिर
अकेला शिष्य
इस ऐतिहासिक परंपरा का
पर क्यों नहीं दोनों......
क्यूँ बढ़ रहा है फासला निरंतर
उत्तर और दक्षिण
दो बिपरीत दिशाओं में
गतिमान
तो रथों के प्रतिपल
प्रतिछन
बढ़ते फासले की तरह.....
कोई भूल
कब, कैसे कहाँ हुई!
अज्ञात है शायद
उसी तरह
जैसे अज्ञात है जबाब
उत्पत्ति का
मुर्गी से अंडे का
या अंडे का मुर्गी से
या फिर उसी तरह
जैसे लोग
भटकते हैं
जानकार भी अनजान बनते हुए
इश्वर की तलाश में
मंदिर-मस्जिद
गिरिजा और गुरुद्वारों में
इश्वर की सर्वत्र व्यापकता को जानते हुए भी...
या फिर एक अहम्
जो आ गया है शिक्षक में
अपने शिक्षक होने का
या असभ्य हो गया है शिष्य
संस्कारों के आभाव में
जो मिलने चाहिए थे
उसे अपने माँ, बाप
दादा, दादी
अपने बुजुर्गों से
या फिर
पद गयी है अमित छाप
पश्चिमी संस्कृति
मूल्यों और परम्पराओं की
जिसमे श्रजित होना
या श्रजित करना
महज एक शारीरिक प्रक्रिया है
और
नतमस्तक होना,
झुकना
किसी के भी सामने
आत्म स्वाभिमान को ठेस पहुचाने की तरह,..
और शायद इसलिए की
एक अच्छा गुरु होने के लिए
जरूरी है अच्छा
शिष्य होना भी
पर शायद
ऐसा अब संभव नहीं दीखता
क्योंकी संस्कार बिहीन शिष्य
न तो होगा कल प्रतिष्ठित गुरु
और
न ही कर सकेगा निर्माण
नए संस्कारित गुरुओं का
और सहस्त्रों बर्षों बाद
गुरु शिष्य के बढे फासले का जिम्मेवार कौन?
बन जाएगा एक प्रश्न
अंडे से मुर्गी के
या
मुर्गी से अंडे की उत्पत्ति की तरह
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801
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