JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

तुम क्यों हंस रहे थे


तुम क्यों हंस रहे थे
अपने कुटीर को अग्रसर
मेरे कदम
सहसा थम गए  थे
पथ में पड़े
कांच के चन्द टुकड़ों को देखकर
जो
लहूलुहान कर सकते थे
कोई भी पाँव
किन्तु उन्हें उठाने को
ज्यों ही
झुके थे मेरे हाथ
उठी थी सहसा ही
एक तीब्र व्यंग्य lahar
पर मैंने उठाया था हर टुकड़ा
मैंने सुना था
हर लहूलुहान तन की पीड़ा तुम्हारी है
पर तुम हंस क्यों रहे थे?
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, . पर
मोबाइल नो 9839167801

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