पीपल के पेड़ के नीचे
खड़ा मैं...
एक तक जब देखता था
गाँव की चौपाल
बैलों की जोड़ी के साथ
लौटता किसान
दरवाजे पे खड़ी
एक तक अपलक निहारती माँ
मुन्नी का दौड़कर
बापू से लिपट जाना
राहुल की मेले जाने की जिद.....
तब कितनी रास आती थी जिंदगी
लोग जीते थे सबके लिए
उनकी एक-एक सांस
समर्पित थी , परिवार को
घर को
पड़ोस को
गाँव को
देश को..................
कैसे लोग भुला देते थे
दिन भर की थकान
गाँव की इकलौती चौपाल पर
हँसते गाते नाचते
आतंक से कितने दूर थे पनघट
कितनी स्वछन्द थी
वो तरुनाई
कैसे डूब जाते थे
उषा किरणों के साथ
कोलाहल से पनघट परिवेश
कैसे उमड़ पड़ता था
माओं का सैलाब
एक चंचला के
कदम रखने पर
अपने पिया की दुनिया में.....
कैसे धर-धर बहते थे आंसू
उस बाप की आँखों से
बाहों पे जिनके झूली थी
वो नन्ही कलि
न जाने कितने सावन
उन आँखों के साथ
बहती थी
और भी आँखें
सिर्फ मातृत्व का बोझ कम करने के लिए
हमेशा ही....
कितना हैरान रह जाता था
कितना जीवंत हो उठता था
पीपल के नीचे खड़ा
जब उसे देखता था
पनघट पे छुपाल पे
खेत, खलीहान
सम्पूर्ण गाँव में...
बही तो सब कुछ थी
मेरा रोम-रोम
मेरी हर सांस
मेरा कतरा कतरा
पर बिगत कुछ समय से
वो , वो ना रही
बदल डाला उसने खुद को
तोड़ दी खामोशी
अब ढल गयी है
अपनी बहिन के
रंग-रूप में
जो आयी थी
इस पवित्र धरा पे
कुछ सदियों पहले
और कुछ दशकों पूर्व
जाने से पहले
छोड़ गयी अपना रंग
अपनी गंध
अपनी चल चलन का अंश
हाँ उसी रंग गंध में डूबी
निकल गयी वो मेरी
आँखों के सामने से
देखा है मैंने उसे स्वयं जाते
रौशनी की चकाचौध से भ्रमित हो
महलों की ओर
कुछ बहकी, नशे में
अधनंगी हालत में
सर छुपाकर
पर लज्जावश नहीं
सिर्फ अपराध बोध से
जो महसूस होता है उसे
कभी कभी
सिर्फ कभी कभी
अपनी बहाई पे
मैं अभी भी खड़ा हूँ
पहले की तरह
पीपल तले
पर थका कमजोर
निश्तेज उसके बियोग में
ये जानते हुए भी कि
बिकने लगी है वो
चन्द टको और शराब के लिए
ये जानते हुए भी कि
सब मिट गए हैं मूल्य
जानता हूँ की बदल गयी है
वो इतनी कि
समझ में नहीं आता फर्क
उसे अब
अपने पुराने और नए रूप में
खुद ही.....
कल एक क़त्ल के जुर्म में
जेल की सैर भी कर आयी
अब नहीं डरती है
सड़क पर चलती है
खुले आम सीना तान
अब नहीं बहती आंसू
बेटी की बिदाई पर
अब आती है पनघट पे
आतंकित करने के लिए
मैं अब भी खड़ा हूँ
पीपल के तले
जानता हुए भी की
बहुत बदल गयी है
बहक गयी है................
लेकिन मैंने भी उसे चाह है
दिल से चाहा है
जी नहीं सकता उसके बिना
मैं जानता हूँ की
बदल गयी है वो
पर ये भी जानता हूँ कि
वो जरूर लौटेगी
कभी न कभी.
उसे लौटना है
मेरे लिए
हम सबके लिए
हाँ वो मेरी संस्कृति है
मेरी अपनी संस्कृति
कभी न कभी छोड़ेगी
अपनी बहिन प्रदत्त
रंग, गंध, चाल चलन के अंश
इसलिए तो आज बी खड़ा हूँ
मौन, चुपचाप,निःशब्द
बिंदा किसी हलचल के
उसी पीपल के तले
क्योंकी मैं जानता हूँ
वो लौटेगी
जरूर लौटेगी
उसे लौटना ही पड़ेगा
वो मेरी है, वो हमारी है
वो हम सबकी है
वो हमारी संस्कृति है
वो लौटेगी
जरूर लौटेगी
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801
No comments:
Post a Comment