आम आदमी की पीड़ा दर्शाते
तुम्हारे गीतों , निबंधों
कहानियों और उपन्यासों की शैली
इंगित करती है उसे दीन-हीन
नकारती है उसका अस्तित्व
जो दधीची की तरह
अर्पित कर देता है अपना लहू
गेंहू के पौधों को
तुम्हारी रोटियों के लिए
निचोड़ देता है खुद को पसीना बनाकर
तुम्हारे प्रासादों के गारे के लिए
पर शायद इंगित करती है तुम्हारी शैली
तुम्हारी भूल को
क्योंकी
ऊंचे शिखरों पर बैठकर
मैदानों में बिचरते हाथियों को
चूहे का दल समझने की तुम्हारी नजर ने
बौना कर दिया है आम आदमी को
किन्तु
बदली में छिपे चाँद की तरह
अनावृत होगा हर सच भी
और मिटते फसलों की तरह
स्वीकारना होगा तुम्हे भी
रोटी से लगते चाँद की विशालता को
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801
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