मेरा साया
मेरा साया चलता रहा
क़दमों से कदम मिला दिन भर
और रात होते ही
गायब हो गया दबे पांब
बेबफा प्रेमिका की तरह
जूझता रहा मैं अकेला
गहन सन्नाटों में
ढूंढता रहा रोशनी की एक किरण
किन्तु सहसा ही
गहन तम को चीरती
सैकड़ों प्रकाशित किरणों से
चमक उठे मेरे चक्षु
और जब दौड़ने लगता हूँ मैं
सहसा ही लगता है
दौड़ रहा है कोई और भी
मेरे साथ, जाना पहचाना
रुकता हूँ उसके लिए
फिर सहसा ही
मेरे होंठों को चीर कर
निकलता है तीब्र स्वर
मेरे साए, धोखेबाज
कहाँ गया था तू?
गिड़गिड़ात़ा है साया
शपथ लेता है, कहीं ना जाने की
फिर चलता है कदम से कदम मिला
अचानक एक गर्जना के साथ
स्याह हो जाता है आकाश
और सिमटते रश्मि पुंज के साथ
खिसकने लगता है साया दबे पाँव
फिर बंद होती हैं पलकें
सामने होते हैं कृष्ण
और जोड़कर दोनों हाथ
मांग लेता हूँ मैं
रोशनी की जगह अनंत अन्धकार
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801
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