ऐ जिन्दगी ख्वाइश नहीं मुझको तेरी
ये फरमाइश है पहली मेरी
मुझको हर वीराने का पत्थर
मौत नजर आता है
मुझको दुनिया में हर जगह
श्मशान नजर आता है
अरे मुर्दों के बीच रहने का
हो गया हूँ आदी
इसलिए हर इंसान
मुर्दा नजर आता है
रंगरेलियों में डूबा
न जाने कैसा इंसान
कैसी है ये दुनिया महान
जो दूसरों के
पोंछ नहीं सकता आंसू
गम दे तो सकता है
मगर ले नहीं सकता
हजारों का क़त्ल करके
कितना खुश है इंसान
बनता है बड़ा नादाँ
ये इंसान
दुसरे इंसान को
खून से भिगो तो सकता
मगर खून की एक बूँद
अपने जिस्म से
दे नहीं सकता
हर वक़्त दूसरों को
सताता है....
इससे अच्छा तो
मुर्दा नजर आता है
जो कब्र में
अनजान चादर को ओढ़े
धुप, गर्मी, सर्दी में पड़ा
खुद को तदपा रहा है
मगर दूसरों को नहीं सता रहा है
लोग उसे भूत के नाम से
बदनाम कर रहे हैं
बिना किसी बात के
इस निरीह जीव से
दर रहे हैं...
ये वीरानों में ही रहते हैं
लेकिन इंसान उर्फ़ ज़िंदा भूत
हर घराने से लेकर
हर वीराने तक रहता है
लोग उससे डर नहीं रहे हैं
जो इन्हें महगाई
भुखमरी, गरीबी के अलावा
कुछ नहीं दे रहे
उन्हें ये देवता कह रहे हैं
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801
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