JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

ऐ गुलाब




ऐ गुलाब 
बगिया में उस दिन तुम्हे देख
बिस्मित हो गयी थीं मेरी आँखें
पुलकित हो उठा था रोम-रोम
देख कर तुम्हारा अलभ्य सौंदर्य
फिर तुम्हे तकते-तकते
तुम्हे समर्पित हो जाने को जागृत मेरी चाह
सहसा ही बिखंडित हो गयी थी
उस भौरे  को देखकर 
जो पूर्णाधिकार के साथ
छू रहा था तुम्हारे रसीले होंठ
अपने होंठों से
और गुदगुदा कर सुना रहा था
तुम्हे सुरीले गीत
कुठाराघातित होती मेरी चाह के साथ
जनम लिया था मेरे अहम् के पौधे ने
और बढ़ गए थे मेरे हाथ तुम्हारी तरफ
तब रोका था तुम्हारे मुस्तैद प्रहरियों ने
कर दिया था मुझे लहू लुहान
किन्तु अगले  प्रयास में 
हाथ लगते ही तुम
बिखर गए थे पांखुरी बन
तिरोहित हो गया था तुम्हारा अतुलनीय सौंदर्य
फिर तुम्हारे बिखराव के साथ ही 
टूट भी गया था मेरा अहम्
फिर मैंने बटोरी थी तुम्हारी 
एक एक पांखुरी
एक पीड़ा के साथ
आज भी गूंजता है एक प्रश्न
मेरे जेहन में बार बार
आखिर क्यों पाना चाहता था मैं
तुम्हारा अतुल सौंदर्य
सरासर जानते हुए भी ये 
कि तुम उस भौरे की अमानत थे 



डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801

No comments:

Post a Comment