क्यूँ घबराते हो
मैंने तो हर नन्ही सी
कोपल को बढ़ते देखा है
मैंने तो फूलों को भी
कलियों से खिलते देखा है
बदले दौर जमाने के
अब बदल गया इंसान
मीत समझ कर जिनको
अपना कह बैठा था
बदले रुख के साथ
बदलते उनको देखा है
उगता सूरज ;लाल रक्त सा
अति मनोरम सुखदाई था
दूर पहाडी से हटकर के
अम्बर पर वो आज चढ़ा था
तब सोचा था
सूरज जग में रोशन
अपना नाम करेगा
हमको भी शीतलता देगा
अपना भी कुछ काम चलेगा
लेकिन
सूरज अम्बर पे जाकर ऐसा इठलाया है
भेजी तपिश भरी किरने
हर कोई झुलसाया है
पर क्यूँ घबराते हो
मैंने हर अभिमानी को
मरते देखा है
और आसमान पर इठलाने वाले सूरज को
शाम ढले हो तेज रहित
सागर में गिरते देखा है
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801
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