नीव की तुम एक रख दो ईंट
बीचा दो एक परत गारे की
झलक जाए स्वेद की एक बूँद
ईंट पर रख ईंट
मैं महल पूरा बना दूंगा
स्वेद में खुद को डूबा लूँगा
मोती इक निज कोष से बस बाँट दो तुम
एक बच्चे को हंसा दो
एक आँगन को सवारों
सैकड़ों आँखों से आंसू पोंछकर
अपना खजाना मैं लुटा दूंगा
नेह की सरिता बहा दूंगा
एक गोली खा लो तुम सीने पे अपने
सूत भर बस कर्ज माँ का उतारो
भारती एक पल को ही मुस्कुराए
झेल कर सीने पर सारी गोलियां
कर्ज तेरा भी चूका दूंगा
भारती को भी हंसा दूंगा
जाती-धर्मों का कमंडल फेक दो
छोड़ दो बातें सभी ये भेद की
द्वेष की चट्टान लावा बन पिघल जाए
प् के नफरत के अगन सारी
दैरो-हरम पर सर झुका दूंगा
हर बंधू को सीने लगा लूँगाe
नीव की तुम एक रख दो ईंट
मैं महल पूरा बना दूंगा
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801
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