तेरी रग-रग में
तेरे कतरे-कतरे में
जिसका डेरा
उसी मालिक को ढूँढने में
तूने कर दिया सबेरा...
मस्जिदों में जा यूं ही देता रहा अजान
मंदिरों में जा बघारा
अपना गीता ज्ञान
गिरिजा में हाथ जोड़े
गुरूद्वारे में गीत गाये
इंसा! ऐ नादाँ
इतना जान नहीं पाए
तेरी आँखों के सामने था
तेरा खुदा
तुम पहचान नहीं पाए
वो जो दूर बैठी है ब्रिद्ध
बिखरे हैं जिसके श्वेत बाल
बक्त के थपेड़ों ने
झुका दी है जिसकी कमर
पिचका दिए हैं गाल
वो बृद्ध चलता है हौले हौले
जिसने जिन्दगी के अनमोल पल
मिटटी के मूल तौले
तुमने कभी सुनी ही कहाँ है
ये दुःख भरी कहानी
ये वो बच्चे हैं
जिन्हें दूध के बदले मिलता है पानी
कीचड, नालियों
फुटपाथों पे पलती
इंसानी जिंदगी..
यही तेरा खुदा है
इनकी सेवा ही तेरी बंदगी
इनकी सेवा ही तेरी पूजा
मस्जिद में तेरी अजान
गिरिजा में जुड़े तेरे हाथ
और गुरूद्वारे का पवित्र गान
इंसा, ऐ नादाँ
तू इतना जान नहीं पाया
तेरी आँखों के सामने था तेरा खुदा
तू पहचान नहीं पाया
तू उसे ढूंढता रहा
ईंटों की दीवारों में
चूने में गारे में
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801
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