JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

कौन हैं ये?


कौन हैं ये?
जो खड़े हो जाते हैं
रोज -रोज...
किसी दूकान, किसी मकान 
मंदिर की चौखटों
या फिर
फुटपाथों पर  हमेशा ही....
कौन हैं ये?
जिनके बस्त्र मलिन
तन जर्जर
झुर्रियों से भरा चेहरा
और है टूटा उदास खिन्न मन
कौन हैं ये?
जो खड़े हैं फैलाए
हाथ, आँचल, रूमाल
या गमछा
एक इंसान होकर
इंसान के सामने
कौन हैं ये?
जो हो व्यथित, परेशां
उठा लेते हैं रोटी,
या रोटी का टुकड़ा
जो फेका था, शायद
किसी ने
 सड़क पर घुमते किसी कुत्ते के लिए
कौन हैं ये ?
ये सवाल पूंछा है
जब-जब किसी ने
किसी से भी,
तब-तब मिला है उत्तर
ये गरीब हैं, भिखारी हैं
अनाथ हैं, असहाय हैं
हर दम देखा है रूखापन
हर उत्तर में
हर दम उठी है ऊँगली
इनके चरित्र पर......
पर!
मैं जानता हूँ उत्तर
इस सवाल का कि
ये कौन हैं, क्या हैं
दरअसल
ये दर्पण हैं
स्वार्थपरक समाज की
शोषण छमता ही हद के
ये बाप हैं,
अह्शान फरामोश बेटों के
ये माएं हैं कुछ हैवानों की
ये बहने हैं कुछ जल्लादों की
जो,
मजबूर करते हैं उन्हें
रात में तन बेचने
और दिन में हाथ फैलाने को
अपनी भौतिकताबादी प्यास के लिए.....
ये बच्चे हैं
जो मिले थे
नालों गटरों और
कचरों के टोकरे में
हाँ ये,
यही बच्चे
ज्वलंत मिशल हैं
भारतीय मूल्यों के नैतिक पतन के
इसलिए
मत कहना , कभी इनसे
भिखारी, लुच्चा और असहाय
मत लगाना दाग
किसी बहिन पर
चरित हीनता का
मत कहना बूढी माँ को डायन
मत कहना इन मासूमों  से
अनाथ, आवारा, लुच्चा
और नाली का कीड़ा,,,,,,,,,,,,,,,,
और शायद ये हक़ भी नहीं है
एक जुल्मी, अहसानफरामोश 
कातिल , जल्लाद
चरित्र हीन , स्वार्थपरक
लोलुप अधर्मी
पापी को,
किसी से कुछ कहने और ऊँगली उठाने का
और मत पूछना  ये सवाल
कि
कौन हैं ये?
क्योंकी
जब धक्के मारकर निकल देगा
तुम्हे
तुम्हारा अपना बेटा
तुम्हारे अपने घर से
या
छोड़ आएगा
किसी फुटपाथ, गली
या मंदिर की चौखट पे
फटे चीथड़ों में,
तब मिल जाएगा
तुम्हे स्वयं ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर
कि
ये कौन हैं?
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

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