तुम वो नहीं ,
जो तुम समझ रहे हो
या जो तुम,
समझ रहे हो
महज एक भ्रम है
क्योंकि
जो दिख रहा है
वो अस्तित्वहीन है
और जो है
वो दिख नहीं रहा है
और भटक रहे हो तुम
उसके लिए
जो कुछ नहीं
सिवाय मृग-मरीचिका के
तुम अगर कुछ हो तो बस
सिर्फ एक निमित्त मात्र
उस जादूगर के
जो नचाता है
उन्हें, तुम्हे मुझे
फिर भी कर रहे हो वो
जो नहीं करना है
और जो करना है
वो विदित ही नहीं.
डॉ आशुतोष मिश्र
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801
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