ये तरु खग -मृग जीवन का सार
इन्सां लगे तुझे क्यूँ भर
क्यूँ उजाड़ डाला इनको
क्या मिल जाएगा तुझको
था पाषाण युगी मानव तू
नग्न बिचरता फिरता था
बर्बर खूनी जीवन जीता
उदर अग्नी से जलता था
लगा तुझे सीने प्रकृति ने
ममता रस का पान कराया
नग्न वादन को ढका अरू
उदराग्नि को शांत कराया
कर्ज चुकाने के बदले
दे डाली नींद मौत की इसको
मिटा दिए वन और तपोवन
मत भूल तरु से ही तू है
है तेरा जीवन
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801
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