तुम क्यों हंस रहे थे
अपने कुटीर को अग्रसर
मेरे कदम
सहसा थम गए थे
पथ में पड़े
कांच के चन्द टुकड़ों को देखकर
जो
लहूलुहान कर सकते थे
कोई भी पाँव
किन्तु उन्हें उठाने को
ज्यों ही
झुके थे मेरे हाथ
उठी थी सहसा ही
एक तीब्र व्यंग्य lahar
पर मैंने उठाया था हर टुकड़ा
मैंने सुना था
हर लहूलुहान तन की पीड़ा तुम्हारी है
पर तुम हंस क्यों रहे थे?
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801