JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

तुम क्यों हंस रहे थे


तुम क्यों हंस रहे थे
अपने कुटीर को अग्रसर
मेरे कदम
सहसा थम गए  थे
पथ में पड़े
कांच के चन्द टुकड़ों को देखकर
जो
लहूलुहान कर सकते थे
कोई भी पाँव
किन्तु उन्हें उठाने को
ज्यों ही
झुके थे मेरे हाथ
उठी थी सहसा ही
एक तीब्र व्यंग्य lahar
पर मैंने उठाया था हर टुकड़ा
मैंने सुना था
हर लहूलुहान तन की पीड़ा तुम्हारी है
पर तुम हंस क्यों रहे थे?
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801

ला माँ मुझे कमंडल दे दे


ला माँ मुझे कमंडल दे दे
लेके माँ के दर जाऊँगा
हाथ जोड़कर नमन करूंगा
भक्ति मांग कर ले आऊंगा
इस भिक्षा से ही दोनों की
फिर मैं भूख मिटाऊंगा
खुद भी इसका पान करूंगा
तुझको पान कराऊंगा
ते अर्जित धन ऐसा होगा
खर्च करो दिन रात बढेगा
जब अनंत रत्नाकर जैसी
हो जायेगी ये संचित निधि
अविरल धरा स्वयं बहेगी
इस अविरल धरा से फिर मैं
सारा जग नहलाऊँगा
ला माँ मुझे कमंडल दे दे.........
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801

बचाना होगा मुझे डूबने से


सिगरेट के पहले काश के साथ ही
आयी थी तीब्र खांसी
और
शराब के पहले घूँट  से
उत्पन्न घृणा के द्वारा
रोका था तुमने मुझे
किन्तु
अहम् वश मैं
जलाता रहा सिगरेट पे सिगरेट
बनाता रहा पैग पे पैग
किन्तु अब
नशे के समुद्र में डूबते हुए
याद आ रहे हैं मुझे
सिन्धु पर सेतु बनाने के प्रयास में
डूबे उन पत्थरों की
जिन पर अंकित नहीं था
तुम्हारा नाम
और याद आ रहे हैं वो भी
जिन्हें तेरा रहे थे नल-नील
तुम्हारे नाम के साथ
अब कोई नल-नील नहीं
जो अंकित कर दे तुम्हारा नाम
मेरे ह्रदय पाषण पर
अब बिराजित होना होगा
तुम्हे स्वयं मेरे अंतर में
और बचाना होगा मुझे डूबने से
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801

तालियों की गडगडाहट


कविता सुनाते ही
गूँज उठी तालियों के साथ ही
व्यथित हो उठता हूँ मैं
छ जाता है सन्नाटा
अंतःकरण में
फिर डुबाता हूँ मैं
अपने लहू में कलम
फिर जागता हूँ सारी रात
इंतज़ार करता हूँ
एक नयी कविता का..
करता रहूँगा मैं प्रयास
यूं ही अनवरत
मैं चाहता हूँ
मेरी हर कविता के बाइ द
छा जाए सदन में
मरघट सी शांति
और गूँज उठे
तालियों की गडगडाहट
मेरे अंतर में
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801




वो खुशहाल क्यूँ है


तुम्हारी बेचैनी ये नहीं की
तुम्हारे पास ये नहीं वो नहीं
तुम्हारी बेचैनी ये है कि
उसके पास ये है वो है
तुम्हारी बेचैनी  ये नहीं कि
सूख रहे हैं तुम्हारे खेत
तुम्हारा बेचैन होना
उसके खेतों का लहलहाना है
तुम इसलिए भी बेचैन नहीं
कि मिलती है सूखी रोटी तुम्हे
तुम्हारी बेचैनी तो
उसकी रोटियों पे चुपड़ा घी है
दुखी, पीड़ित, परेशान होना
कारन नहीं तुम्हारी बेचैनी का
तुम बेचैन सिर्फ  इसलिए हो
वो खुशहाल  क्यूँ  है
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801

तुम वो नहीं ,
जो तुम समझ रहे हो
या जो तुम,
समझ रहे हो
महज एक भ्रम है
क्योंकि
जो दिख रहा है
वो अस्तित्वहीन है
और जो है
वो दिख नहीं रहा है
और भटक रहे हो तुम
उसके लिए
जो कुछ  नहीं
सिवाय  मृग-मरीचिका के
तुम अगर कुछ हो तो बस
सिर्फ एक निमित्त मात्र
उस जादूगर के
जो नचाता है
उन्हें, तुम्हे मुझे
फिर भी कर रहे हो वो
जो नहीं करना है
और जो करना है
वो  विदित  ही नहीं.
डॉ  आशुतोष मिश्र
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, उ. पर
मोबाइल नो 9839167801