बाशिंदे एक बस्ती के
इस शहर की हर गली में
देखे हैं मैंने
सिर्फ दो ही नज़ारे
एक बहाँ के बाशिंदों के
ओंठों पे राखी उंगलियाँ
जो संकेत देती हैं
उनके मौन ब्रत
भीरूपन और नामर्दगी का
हमेशा ही,
और
दूसरी तरफ
जलती हुई आँखें, उठे हाथ
लगातार खुलते बंद होते ओंठ
किसी गर्जना के साथ........
उस दिन भी गुजर रहा था
एक ऐसी गी गली से
सहसा ही बाजू से निकल गया
गलती आँखों, उठे हाथों
और
गर्जनामय खुलते बंद होते ओंठों वाला
बही जत्था
जब तक समझ पाती मेरी नजरें
तब तक
रुक गया जत्था
घास,फूस, खपरैलों से ढके
झोपड़े के दरवाजे पे
और सहसा ही
एक रोबीली आवाज से
खुल गए दरवाजे के पट
सामने खड़ी थी
रामू काका की
जवान,नव्योवना आकर्षक बेटी
चंद लम्हों तक देखती रही
मासूम आँखों से
खूनी दरिंदों को
सहसा पांवों और हाथों में हुई हलचल
शायद पीछे हटने के लिए
या दरवाजे को पूर्वावस्था में लाने के लिए
लेकिन,
उससे भी चौकन्नी थीं
खुली आँखें
उठे हाथ नीचे झुके
और एक झटके में आ गयी
नव्योवना दहलीज के बाहर
घिसटते हुए
और शायद इस उम्मीद से
अनादी काल में
महाभारत की द्रोपदी की तरह
बिखरी केश राशी
तन के अस्त व्यस्त कपड़ों
और
सम्पूर्ण परिवेश को रुला देने वाली
चीख के साथ
बाशिंदे अभी भी छु थे बस्ती के
प्रतिज्ञाबद्ध थे जैसे
भीष्म, द्रोणाचार्य और ध्रतराष्ट्र की तरह
ओंठों से उंगलियाँ न उठाने के लिए
एक बार फिर मुड गए
एक नव्योवना के कदम
घर की दहलीज से दूर
तन की मंडी को
जहाँ बेचे और खरीदे जाते हैं
तन,
चाँद सिक्कों में
भारत में देवी की तरह प्रतिष्ठित
नारी के....
सहसा ही, गूँज उठी
एक आवाज
नपुंसकों की बस्ती में
रामू काका की पड़ोसन
बिधवा दुलारी बाई की
जिसने वर्षों पूर्व देखा था
इन्ही आँखों के सामने
खूनी दरिंदों के हाथों
दम तोड़ता अपना पति
और
चंद रोजात बाद उठती
बेटी, बहू की लाशें
और सुना था क्रंदन
इन्ही कानों से
उन मासूम बच्चों का
जिन्हें विरासत में दे गया था
उसका बाप
एक अदद बूढ़ी दादी माँ
पर रोज की मौत ने
जीवंत कर दिया था उसे
शायद
इसलिए उसने हटा ली उंगलियाँ
ओंठों से
खड़ी हो गयी चंडी सी
उन दरिंदों के सामने
बिना परवाह के
उन मासूम बच्चों की
सोचकर यही
शायद हट जायेगी उंगलियाँ
इन नपुंसकों के ओंठों से
पर
पूर्वानुमानित ऐसा कुछ ना हुआ
लगातार चलते रहे खंजर
बिधवा के सीने पर
और
माचिस की एक तीली से
घिर गया उसका सम्पूर्ण घर
आग की लपटों में
गूंजती रही
मासूम बच्चों के करुणामयी आवाजें
शायद किसी हाथ के लिए
किसी साथ के लिए
लेकिन.....
लेखिन फिर भी नहीं हटी उंगलियाँ
वाशिंदों के ओंठों से
जत्था गुजर गया
करुण क्रंदन खामोश हो गया
लोग मुड गए अपने घरों की तरफ
पर, सहसा गुनी
आसमान को कम्पित करती आवाज
कब तक उंगलियाँ
ओंठों से नहीं उठाओगे
आज रामू काका की बेटी
कल तुम्हारी
आज बिधवा माँ का घर
कल तुम्हारा
कब तक उंगलियाँ
ओंठों से नहीं हटाओगे
लेकिन...
लेकिन उंगलियाँ हटी नहीं
नपुंसकों के ओंठों से
मैं बैठ गया
दुखी, उदास अनमयस्क हो
तर्कों से जूझते
गुजर गए सहस्त्रों पल
और
फिर समझ गया मैं
ये खामोशी
ये नपुंसकता
रच गयी है , बस गयी है
इनके खून में
ये लुटते रहेंगे मिटते रहेंगे
बिकते रहेंगे हमेशा ही
क्योंकी
बदल गयी है इनकी
शारीरिक संरचना भी
कान हैं पर सुनते नहीं
आँख है पर देखती नहीं
ये नपुंसकता इनकी पहचान है
ये मिट जायेंगे , बिक जायेंगे
पर..
पर उंगलियाँ अपने
ओंठों से नहीं हटायेंगे
हाँ ये अपनी उंगलियाँ
ओंठों से नहीं हटायेंगे
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा.उ.प्र. मोबाइल नंबर 9839167801