JO DIN NE KAHA

Thursday, 9 August 2012

ये नपुंसकता इनकी पहचान है


बाशिंदे एक बस्ती के
इस शहर की हर गली में
देखे हैं मैंने 
सिर्फ दो ही नज़ारे
एक बहाँ के बाशिंदों के
ओंठों पे  राखी उंगलियाँ
जो संकेत देती हैं
उनके मौन ब्रत
भीरूपन और नामर्दगी का
हमेशा ही,
और
दूसरी तरफ 
जलती हुई आँखें, उठे हाथ
लगातार खुलते बंद होते ओंठ
किसी गर्जना के साथ........
उस दिन भी गुजर रहा था
एक ऐसी गी गली से
सहसा ही बाजू से निकल गया
गलती आँखों, उठे हाथों 
और
गर्जनामय खुलते बंद होते ओंठों वाला
बही जत्था
जब तक समझ पाती मेरी नजरें
तब तक
रुक गया जत्था
घास,फूस, खपरैलों से ढके
झोपड़े के दरवाजे पे
और सहसा ही
एक रोबीली आवाज से
खुल गए दरवाजे के पट
सामने खड़ी थी
रामू काका की
जवान,नव्योवना आकर्षक बेटी
चंद लम्हों तक देखती रही
मासूम आँखों से
खूनी दरिंदों को
सहसा पांवों और हाथों में हुई हलचल
शायद पीछे हटने के लिए
या दरवाजे को पूर्वावस्था में लाने के लिए
लेकिन,
उससे भी चौकन्नी थीं
खुली आँखें
उठे हाथ नीचे झुके
और एक झटके में आ गयी
नव्योवना दहलीज के बाहर
घिसटते हुए
और शायद इस उम्मीद से
अनादी काल में
महाभारत की द्रोपदी की तरह
बिखरी केश राशी
तन के अस्त व्यस्त कपड़ों
और
सम्पूर्ण परिवेश को रुला देने वाली
चीख के साथ
बाशिंदे अभी भी छु थे बस्ती के
प्रतिज्ञाबद्ध थे जैसे
भीष्म, द्रोणाचार्य  और ध्रतराष्ट्र  की तरह
ओंठों से उंगलियाँ न उठाने के लिए
एक बार फिर मुड गए
एक नव्योवना के कदम
घर की दहलीज से दूर
तन की मंडी को
जहाँ बेचे और खरीदे जाते हैं
तन,
चाँद सिक्कों में
भारत में देवी की तरह प्रतिष्ठित 
नारी के....
सहसा ही, गूँज उठी
एक आवाज
नपुंसकों की बस्ती में
रामू काका की पड़ोसन
बिधवा दुलारी बाई की
जिसने वर्षों पूर्व देखा था
इन्ही आँखों के सामने
खूनी दरिंदों के हाथों
दम तोड़ता अपना पति
और
चंद  रोजात बाद उठती
बेटी, बहू की लाशें
और सुना था क्रंदन
इन्ही कानों से 
उन मासूम बच्चों का 
जिन्हें विरासत में दे गया था
उसका बाप
एक अदद बूढ़ी दादी माँ
पर रोज की मौत ने
जीवंत कर दिया था उसे
शायद
इसलिए उसने हटा ली उंगलियाँ
ओंठों से
खड़ी हो गयी चंडी  सी
उन दरिंदों के सामने
बिना परवाह के 
उन मासूम बच्चों की
सोचकर  यही
शायद हट जायेगी उंगलियाँ
इन नपुंसकों के ओंठों से
पर
पूर्वानुमानित ऐसा कुछ ना हुआ
लगातार चलते रहे खंजर
बिधवा के सीने पर 
और
माचिस की एक तीली से
घिर गया उसका सम्पूर्ण घर
आग की लपटों में
गूंजती रही 
मासूम बच्चों के करुणामयी आवाजें
शायद  किसी हाथ के लिए
किसी साथ के लिए
लेकिन.....
लेखिन फिर भी नहीं हटी उंगलियाँ
वाशिंदों के ओंठों से
जत्था गुजर गया
करुण क्रंदन खामोश हो गया
लोग मुड गए अपने घरों की तरफ
पर, सहसा गुनी 
आसमान को कम्पित करती आवाज
कब तक उंगलियाँ 
ओंठों से नहीं उठाओगे
आज रामू काका की बेटी
कल तुम्हारी
आज बिधवा माँ का घर
कल तुम्हारा
कब तक उंगलियाँ
ओंठों से नहीं हटाओगे
लेकिन...
लेकिन उंगलियाँ हटी नहीं
नपुंसकों के ओंठों से 
मैं बैठ गया
दुखी, उदास अनमयस्क  हो
तर्कों से जूझते  
गुजर गए सहस्त्रों पल 
और 
फिर समझ गया मैं
ये खामोशी 
ये  नपुंसकता 
रच गयी है ,  बस  गयी है 
इनके  खून  में
ये लुटते  रहेंगे   मिटते रहेंगे  
बिकते  रहेंगे  हमेशा ही
क्योंकी 
बदल गयी है  इनकी
शारीरिक  संरचना  भी
कान हैं पर सुनते नहीं
आँख  है  पर देखती नहीं
ये नपुंसकता इनकी पहचान है 
ये मिट  जायेंगे , बिक  जायेंगे 
पर..
पर उंगलियाँ अपने 
ओंठों से नहीं हटायेंगे  
हाँ  ये  अपनी   उंगलियाँ
ओंठों से नहीं हटायेंगे  
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा.उ.प्र. मोबाइल नंबर 9839167801

छूना चाहती थी आकाश


साहित्य के एक
उत्कृष्ट सम्मलेन में
पुज रहे थे वो
और झुक रहे थे
सैकड़ों युवा साहित्यकार
उनके चरणों में
मानवीय मूल्यों के चिंतन पर
उनकी कृति ने,
कर दिया था उन्हें लब्ध प्रतिष्ठित
टयूब लाईट की दूधिया रोशनी में
गैलरी में सजी
सैकड़ों सुन्दर किताबों में
दमक रही थी अलग
उनकी एक सुन्दर किताब
किताब की जिल्द पर छपी थी
दरिंदों  के हाथों में छटपटाती
खूबसूरत अवला के रूप में
मानवता की तस्वीर
जिल्द की ख़ूबसूरती से प्रभावित
मुड गए मेरे कदम
तीन सितारा होटल की
तीसरी मंजिल के
उनके कमरे की तरफ
और
दस्तक देते ही खुल गए
भूलवश बंद किये गए दर के पट
और सहसा ही खिसक गयी
मेरे पैरों तले की जमीन भी
कमरे के भीतर
एक अर्ध नग्न षोडशी कन्या की
नग्न पीठ पर
कहानी लिख रही थी
उस लब्ध प्रतिष्ठित कृतिकार की उंगलियाँ
वो षोडशी थी एक नवोदित साहित्य सर्जक
और छूना चाहती  थी आकाश
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, . प्र. मोबाइल नो 9839167801

स्वीकारना होगा तुम्हे भी




आम आदमी की पीड़ा दर्शाते
तुम्हारे गीतों , निबंधों
कहानियों और उपन्यासों की शैली
इंगित करती है उसे दीन-हीन
नकारती है उसका अस्तित्व
जो दधीची की तरह
अर्पित कर देता है अपना लहू
गेंहू के पौधों को
तुम्हारी रोटियों के लिए
निचोड़ देता है खुद को पसीना बनाकर
तुम्हारे प्रासादों के गारे के लिए
पर शायद इंगित करती है तुम्हारी शैली
तुम्हारी भूल को
क्योंकी
ऊंचे शिखरों पर बैठकर
मैदानों में बिचरते हाथियों  को 
चूहे का दल समझने की तुम्हारी नजर ने
बौना कर दिया है आम आदमी को
किन्तु
बदली में छिपे चाँद की तरह
अनावृत होगा हर सच भी
और मिटते फसलों की तरह
स्वीकारना होगा तुम्हे भी
रोटी से लगते चाँद की विशालता को 
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801

ऐ गुलाब




ऐ गुलाब 
बगिया में उस दिन तुम्हे देख
बिस्मित हो गयी थीं मेरी आँखें
पुलकित हो उठा था रोम-रोम
देख कर तुम्हारा अलभ्य सौंदर्य
फिर तुम्हे तकते-तकते
तुम्हे समर्पित हो जाने को जागृत मेरी चाह
सहसा ही बिखंडित हो गयी थी
उस भौरे  को देखकर 
जो पूर्णाधिकार के साथ
छू रहा था तुम्हारे रसीले होंठ
अपने होंठों से
और गुदगुदा कर सुना रहा था
तुम्हे सुरीले गीत
कुठाराघातित होती मेरी चाह के साथ
जनम लिया था मेरे अहम् के पौधे ने
और बढ़ गए थे मेरे हाथ तुम्हारी तरफ
तब रोका था तुम्हारे मुस्तैद प्रहरियों ने
कर दिया था मुझे लहू लुहान
किन्तु अगले  प्रयास में 
हाथ लगते ही तुम
बिखर गए थे पांखुरी बन
तिरोहित हो गया था तुम्हारा अतुलनीय सौंदर्य
फिर तुम्हारे बिखराव के साथ ही 
टूट भी गया था मेरा अहम्
फिर मैंने बटोरी थी तुम्हारी 
एक एक पांखुरी
एक पीड़ा के साथ
आज भी गूंजता है एक प्रश्न
मेरे जेहन में बार बार
आखिर क्यों पाना चाहता था मैं
तुम्हारा अतुल सौंदर्य
सरासर जानते हुए भी ये 
कि तुम उस भौरे की अमानत थे 



डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801

मेरा साया



मेरा साया
मेरा साया चलता रहा
क़दमों से कदम मिला दिन भर
और रात होते ही
गायब हो गया दबे पांब
बेबफा प्रेमिका की तरह
जूझता रहा मैं अकेला
गहन सन्नाटों में
ढूंढता रहा रोशनी की एक किरण
किन्तु सहसा ही 
गहन तम को चीरती
सैकड़ों  प्रकाशित किरणों से 
चमक उठे मेरे चक्षु
और जब दौड़ने लगता हूँ मैं
सहसा ही लगता है 
दौड़ रहा है कोई और भी
मेरे साथ, जाना पहचाना
रुकता हूँ उसके लिए
फिर सहसा ही
मेरे होंठों को चीर कर 
निकलता है तीब्र स्वर
मेरे साए, धोखेबाज
कहाँ गया था तू?
गिड़गिड़ात़ा है साया
शपथ लेता है, कहीं ना जाने की
फिर चलता है कदम से कदम मिला
अचानक एक गर्जना  के साथ 
स्याह  हो जाता  है आकाश 
और सिमटते रश्मि पुंज के साथ
खिसकने लगता है साया दबे पाँव
फिर बंद होती हैं पलकें
सामने होते हैं कृष्ण
और जोड़कर दोनों हाथ 
मांग लेता हूँ मैं 
रोशनी की जगह अनंत अन्धकार 


डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. प्र. मोबाइल नो 9839167801

तरु


ये तरु खग -मृग जीवन का सार
इन्सां लगे तुझे क्यूँ भर
क्यूँ उजाड़ डाला इनको
क्या मिल जाएगा तुझको
था पाषाण युगी मानव तू
नग्न बिचरता  फिरता था
बर्बर खूनी जीवन जीता
उदर अग्नी से जलता था
लगा तुझे सीने प्रकृति ने
ममता रस का पान कराया
नग्न वादन को ढका अरू
उदराग्नि को शांत कराया
कर्ज चुकाने के बदले
दे डाली नींद मौत की इसको
मिटा दिए वन और तपोवन
मत भूल तरु से ही तू है
है तेरा जीवन
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, . प्र. मोबाइल नो 9839167801

ऐ जिन्दगी ख्वाइश नहीं मुझको तेरी


ऐ जिन्दगी ख्वाइश नहीं मुझको तेरी
ये फरमाइश है पहली मेरी
मुझको हर वीराने का पत्थर
मौत नजर आता है
मुझको दुनिया में हर जगह
श्मशान नजर आता है
अरे मुर्दों के बीच रहने का
हो गया हूँ आदी
इसलिए हर इंसान
मुर्दा नजर आता है
रंगरेलियों में डूबा
न जाने  कैसा  इंसान
कैसी  है ये दुनिया महान
जो दूसरों के
पोंछ नहीं सकता आंसू
गम दे तो सकता है
मगर ले नहीं सकता
हजारों का क़त्ल करके
कितना खुश है इंसान
बनता है बड़ा नादाँ
ये इंसान
दुसरे इंसान को
खून से भिगो तो सकता
मगर खून की एक बूँद
अपने जिस्म से
दे नहीं सकता
हर वक़्त दूसरों को
सताता है....
इससे अच्छा तो
मुर्दा  नजर आता है
जो कब्र में
अनजान चादर को ओढ़े
धुप, गर्मी, सर्दी में पड़ा
खुद को तदपा रहा है
मगर दूसरों को नहीं सता रहा है
लोग उसे भूत के नाम से
बदनाम कर रहे हैं
बिना किसी बात के
इस निरीह जीव से
दर रहे हैं...
ये वीरानों में ही रहते हैं
लेकिन इंसान उर्फ़ ज़िंदा भूत
हर घराने से लेकर
हर वीराने तक रहता है
लोग उससे डर नहीं रहे हैं
जो इन्हें महगाई
भुखमरी, गरीबी के अलावा
कुछ नहीं दे रहे
उन्हें ये देवता कह रहे हैं
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

मानवता


आज मानवता रो  रही है
निकल कर दिलों से
अँधेरे बीरानों में सो रही है
मानवता तो बस 
शब्दकोष का शब्द रह गयी है
ढूढ़ रहा है हर कोई
न जाने कहाँ खो गयी है
किसी ने बताया 
मानवता बहाँ  रह रही है
पहुंचा तो पता चला
मानवता सो रही है
मैंने खुद को धाडस बंधाया
फिर मानवता के पास आया
हाथ जोड़कर की विनती
मानवता जी आप रो रही हैं
इन वीरानों में खो रही हैं
क्या चक्र के बिना रथ पूरा हो सकता है
जिसमे आप नहीं वो मानव कैसे हो सकता है
मानवता का कंठ भर आया
अपने हाथों से मुझे सहलाया
अरे पागल
तू क्यूँ मुझे प्यार करता है
अपने दिल में जगह मेरे लिए रखता है
मेरी बांहों में मत आ
 सिमट जाएगा
क्या करेगा मानव बनकर 
तेरा अस्तित्व मिट जाएगा
क्यूंकि
ये मानवों का नहीं
दानवों का राज है
दानवता से अपनी मानवता को कैसे बचाएगा
कहाँ कहाँ पुकारेगा
कहाँ कहाँ जाएगा
दुनिया के तख़्त ताजों पे शीश झुकाएगा
वहां भी तुझे दानव नजर आएगा
तेरी मानवता फिर एक रात की मेहमान बन जायेगी
सुबह मुह दिखाने के काबिल न रह पायेगी
आज दुनिया के हर तख़्त-ओ-ताज पे दानव हैं
लेकिन फुटपाथ पे अब भी कुछ मानव हैं
ये सोचकर फुटपाथ पर चली जाती थी
लेकिन दानवों के दलालों ने 
फुटपाथ भी खरीद रखे हैं
बीच बाज़ार में
हर बार लुट जाती हूँ
इसलिए छुप कर सोती हूँ
वीरानों में रोती हूँ
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

तू पहचान नहीं पाया


तेरी रग-रग में
तेरे कतरे-कतरे में
जिसका डेरा
उसी मालिक को ढूँढने में
तूने कर दिया सबेरा...
मस्जिदों में जा यूं ही देता रहा अजान
मंदिरों में जा बघारा 
अपना गीता ज्ञान
गिरिजा में हाथ जोड़े
गुरूद्वारे में गीत गाये
इंसा! ऐ नादाँ
इतना जान नहीं पाए    
तेरी आँखों के सामने था
तेरा खुदा 
तुम पहचान नहीं पाए
वो जो दूर बैठी है ब्रिद्ध
बिखरे हैं जिसके श्वेत बाल
बक्त के थपेड़ों ने 
झुका दी है जिसकी कमर
पिचका दिए हैं गाल
वो बृद्ध चलता है हौले हौले
जिसने जिन्दगी के अनमोल पल
मिटटी के मूल तौले
तुमने कभी सुनी  ही कहाँ है 
ये दुःख भरी कहानी
ये वो बच्चे हैं
जिन्हें दूध के बदले मिलता है पानी
कीचड, नालियों 
फुटपाथों पे पलती
इंसानी जिंदगी..
यही तेरा खुदा है
इनकी सेवा ही तेरी बंदगी
इनकी सेवा ही तेरी पूजा
मस्जिद में तेरी अजान
गिरिजा में जुड़े  तेरे हाथ
और गुरूद्वारे का पवित्र गान 
इंसा, ऐ नादाँ
तू इतना जान नहीं पाया
तेरी आँखों के सामने था तेरा खुदा 
तू पहचान नहीं पाया
तू उसे ढूंढता रहा
ईंटों की दीवारों में
चूने में गारे में 

डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801


क्यूँ घबराते हो


क्यूँ घबराते हो
मैंने तो हर नन्ही सी
कोपल को बढ़ते देखा है
मैंने तो फूलों को भी 
कलियों से खिलते देखा है
बदले दौर जमाने के
अब बदल गया इंसान
मीत समझ कर जिनको 
अपना कह बैठा था
बदले रुख के साथ
बदलते उनको देखा है
उगता सूरज ;लाल रक्त  सा   
अति  मनोरम  सुखदाई  था 
दूर पहाडी से हटकर के
अम्बर पर वो आज चढ़ा था
तब सोचा था
सूरज जग में रोशन 
अपना नाम करेगा
हमको भी शीतलता देगा
अपना भी कुछ काम चलेगा
लेकिन
सूरज अम्बर पे जाकर ऐसा इठलाया है
भेजी  तपिश  भरी किरने
हर कोई झुलसाया है
पर क्यूँ घबराते हो
मैंने हर अभिमानी को 
मरते देखा है
और  आसमान पर इठलाने  वाले  सूरज  को
शाम  ढले हो तेज रहित 
सागर में गिरते देखा है
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

गुरु शिष्य परंपरा


गुरु शिष्य परंपरा
चल रही थी,
जो एक परंपरा
एक श्रद्धामयी 
और
गहन आत्मीयता  की बुनियाद पर
अनादी कल से आज तक......
क्यूँ होने लगी सहसा ही
बिखंडित
छिन्न-भिन्न उसी लाश की तरह
जो बिखर जाती है
चीथड़ों और लोथड़ों में
बम के एक धमाके से...
आज निर्वाह कर रहा है
अकेला गुरु
या फिर 
अकेला शिष्य
इस ऐतिहासिक परंपरा का
पर क्यों नहीं दोनों......
क्यूँ बढ़ रहा है फासला निरंतर
उत्तर और दक्षिण 
दो बिपरीत दिशाओं में 
गतिमान
तो रथों  के प्रतिपल
प्रतिछन  
बढ़ते फासले की तरह.....
कोई भूल
कब, कैसे कहाँ हुई!
अज्ञात है शायद 
उसी तरह
जैसे अज्ञात है जबाब
उत्पत्ति का
मुर्गी से अंडे का
या अंडे का मुर्गी से
या फिर उसी तरह
जैसे लोग
 भटकते हैं
जानकार भी अनजान बनते हुए
इश्वर की तलाश में
मंदिर-मस्जिद 
गिरिजा और गुरुद्वारों में
इश्वर की सर्वत्र व्यापकता को जानते हुए भी...
या फिर एक अहम्
 जो आ गया है शिक्षक में
अपने शिक्षक होने का 
या असभ्य हो गया है शिष्य
संस्कारों के आभाव में
जो मिलने चाहिए थे
उसे अपने माँ, बाप
दादा, दादी
अपने बुजुर्गों से
या फिर
पद गयी है अमित छाप
पश्चिमी संस्कृति
मूल्यों  और परम्पराओं की
जिसमे श्रजित होना 
या श्रजित  करना
महज एक शारीरिक प्रक्रिया है
और 
नतमस्तक होना,
झुकना
किसी के भी सामने
आत्म स्वाभिमान को ठेस पहुचाने की तरह,..
और शायद इसलिए की
एक अच्छा गुरु होने के लिए
जरूरी है अच्छा 
शिष्य होना भी
पर शायद 
ऐसा अब संभव  नहीं दीखता 
क्योंकी संस्कार बिहीन शिष्य
न तो होगा कल प्रतिष्ठित गुरु
और 
न ही कर सकेगा निर्माण
नए संस्कारित गुरुओं का
और सहस्त्रों बर्षों बाद 
गुरु शिष्य के बढे फासले का जिम्मेवार कौन?
बन जाएगा एक प्रश्न
अंडे से मुर्गी के
या 
मुर्गी से अंडे की उत्पत्ति की तरह
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

वो लौटेगी...... जरूर लौटेगी वो लौटेगी जरूर लौटेगी


पीपल के पेड़ के नीचे
खड़ा मैं...
एक तक जब देखता था
गाँव की चौपाल
बैलों की जोड़ी के साथ 
लौटता  किसान
दरवाजे पे खड़ी
एक तक अपलक निहारती माँ
मुन्नी का दौड़कर 
बापू से लिपट जाना
राहुल की मेले जाने की जिद.....
तब कितनी रास आती थी जिंदगी
लोग जीते थे सबके लिए
उनकी एक-एक सांस 
समर्पित थी , परिवार को
घर को 
पड़ोस को
गाँव  को
देश को..................
कैसे लोग भुला देते थे 
दिन भर की थकान
गाँव की इकलौती चौपाल पर
हँसते गाते नाचते
आतंक से कितने दूर  थे पनघट
कितनी स्वछन्द  थी 
वो तरुनाई 
कैसे डूब  जाते थे
उषा  किरणों के साथ
कोलाहल से पनघट परिवेश 
कैसे उमड़ पड़ता  था
माओं का सैलाब
एक चंचला के 
कदम रखने पर 
अपने पिया की दुनिया में.....
कैसे धर-धर बहते थे आंसू
उस बाप की आँखों से
बाहों पे जिनके झूली थी
वो नन्ही कलि
न जाने कितने सावन
उन आँखों के साथ
बहती थी
और भी आँखें
सिर्फ मातृत्व का बोझ कम करने के लिए
हमेशा ही....
कितना हैरान रह जाता था 
कितना जीवंत हो उठता था
पीपल के नीचे खड़ा 
जब उसे देखता था 
पनघट पे छुपाल पे
खेत, खलीहान 
सम्पूर्ण  गाँव में...
बही तो सब कुछ थी
मेरा रोम-रोम 
मेरी हर सांस
मेरा कतरा कतरा
पर बिगत कुछ समय से
वो , वो ना रही
बदल डाला उसने खुद को
तोड़ दी खामोशी
अब ढल गयी है 
अपनी बहिन के 
रंग-रूप में
जो आयी थी 
इस पवित्र धरा पे
कुछ सदियों  पहले
और कुछ दशकों पूर्व
जाने से पहले
छोड़ गयी अपना रंग
अपनी गंध 
अपनी चल चलन का अंश
हाँ उसी रंग गंध में डूबी
निकल गयी वो मेरी 
आँखों के सामने से
देखा है मैंने उसे स्वयं जाते
रौशनी की चकाचौध से भ्रमित हो
महलों की ओर
कुछ बहकी, नशे में
अधनंगी हालत में
सर छुपाकर
पर लज्जावश नहीं
सिर्फ अपराध बोध से
जो महसूस होता है उसे
कभी कभी
सिर्फ कभी कभी
अपनी बहाई पे
मैं अभी भी खड़ा हूँ
पहले की तरह
पीपल तले
पर थका कमजोर
निश्तेज उसके बियोग में
ये जानते हुए भी कि
बिकने लगी है वो
चन्द टको और शराब के लिए
 ये जानते हुए भी कि
सब मिट गए हैं मूल्य 
जानता हूँ की बदल गयी है 
वो इतनी कि
समझ में नहीं आता फर्क
उसे अब
अपने पुराने और नए रूप में
खुद ही.....
कल  एक क़त्ल  के जुर्म  में
जेल की सैर भी कर आयी
अब नहीं डरती  है
सड़क पर चलती है
खुले आम सीना तान
अब नहीं बहती आंसू
बेटी की बिदाई पर
अब  आती है पनघट पे
आतंकित करने के लिए
मैं अब भी खड़ा हूँ 
पीपल के तले
जानता हुए भी की 
बहुत बदल गयी है
बहक  गयी है................
लेकिन मैंने भी उसे चाह है
दिल से चाहा है
जी नहीं सकता  उसके बिना 
मैं जानता हूँ की 
बदल गयी है वो
पर ये भी जानता हूँ कि
वो जरूर लौटेगी
कभी न कभी.
उसे लौटना है
मेरे लिए
हम सबके लिए
हाँ वो मेरी संस्कृति है
मेरी अपनी संस्कृति
कभी न कभी छोड़ेगी
अपनी बहिन प्रदत्त 
रंग, गंध, चाल चलन के अंश
इसलिए तो आज बी खड़ा हूँ

मौन, चुपचाप,निःशब्द
बिंदा किसी हलचल के
उसी पीपल के तले
क्योंकी मैं जानता हूँ
वो लौटेगी
जरूर लौटेगी
उसे लौटना ही पड़ेगा
वो मेरी है, वो हमारी है
वो हम सबकी  है
वो हमारी  संस्कृति है
वो लौटेगी 
जरूर लौटेगी 



डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

कौन हैं ये?


कौन हैं ये?
जो खड़े हो जाते हैं
रोज -रोज...
किसी दूकान, किसी मकान 
मंदिर की चौखटों
या फिर
फुटपाथों पर  हमेशा ही....
कौन हैं ये?
जिनके बस्त्र मलिन
तन जर्जर
झुर्रियों से भरा चेहरा
और है टूटा उदास खिन्न मन
कौन हैं ये?
जो खड़े हैं फैलाए
हाथ, आँचल, रूमाल
या गमछा
एक इंसान होकर
इंसान के सामने
कौन हैं ये?
जो हो व्यथित, परेशां
उठा लेते हैं रोटी,
या रोटी का टुकड़ा
जो फेका था, शायद
किसी ने
 सड़क पर घुमते किसी कुत्ते के लिए
कौन हैं ये ?
ये सवाल पूंछा है
जब-जब किसी ने
किसी से भी,
तब-तब मिला है उत्तर
ये गरीब हैं, भिखारी हैं
अनाथ हैं, असहाय हैं
हर दम देखा है रूखापन
हर उत्तर में
हर दम उठी है ऊँगली
इनके चरित्र पर......
पर!
मैं जानता हूँ उत्तर
इस सवाल का कि
ये कौन हैं, क्या हैं
दरअसल
ये दर्पण हैं
स्वार्थपरक समाज की
शोषण छमता ही हद के
ये बाप हैं,
अह्शान फरामोश बेटों के
ये माएं हैं कुछ हैवानों की
ये बहने हैं कुछ जल्लादों की
जो,
मजबूर करते हैं उन्हें
रात में तन बेचने
और दिन में हाथ फैलाने को
अपनी भौतिकताबादी प्यास के लिए.....
ये बच्चे हैं
जो मिले थे
नालों गटरों और
कचरों के टोकरे में
हाँ ये,
यही बच्चे
ज्वलंत मिशल हैं
भारतीय मूल्यों के नैतिक पतन के
इसलिए
मत कहना , कभी इनसे
भिखारी, लुच्चा और असहाय
मत लगाना दाग
किसी बहिन पर
चरित हीनता का
मत कहना बूढी माँ को डायन
मत कहना इन मासूमों  से
अनाथ, आवारा, लुच्चा
और नाली का कीड़ा,,,,,,,,,,,,,,,,
और शायद ये हक़ भी नहीं है
एक जुल्मी, अहसानफरामोश 
कातिल , जल्लाद
चरित्र हीन , स्वार्थपरक
लोलुप अधर्मी
पापी को,
किसी से कुछ कहने और ऊँगली उठाने का
और मत पूछना  ये सवाल
कि
कौन हैं ये?
क्योंकी
जब धक्के मारकर निकल देगा
तुम्हे
तुम्हारा अपना बेटा
तुम्हारे अपने घर से
या
छोड़ आएगा
किसी फुटपाथ, गली
या मंदिर की चौखट पे
फटे चीथड़ों में,
तब मिल जाएगा
तुम्हे स्वयं ही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर
कि
ये कौन हैं?
डॉ आशुतोष मिश्र/आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी/बभनान, गोंडा, उ. पर/मोबाइल नो 9839167801

नीव की तुम एक रख दो ईंट


नीव की तुम एक रख दो ईंट
बीचा दो एक परत गारे की
झलक जाए स्वेद की एक बूँद
ईंट पर रख ईंट
मैं महल पूरा बना दूंगा
स्वेद में खुद को डूबा लूँगा
मोती इक निज कोष से बस बाँट दो तुम
एक बच्चे को हंसा दो
एक आँगन को सवारों
सैकड़ों आँखों से आंसू पोंछकर
अपना खजाना मैं लुटा दूंगा
नेह की सरिता बहा दूंगा
एक गोली खा लो तुम सीने पे अपने
सूत भर बस कर्ज माँ का उतारो
भारती एक पल को ही मुस्कुराए 
झेल कर सीने पर सारी गोलियां
कर्ज तेरा भी चूका दूंगा
भारती को भी हंसा दूंगा
जाती-धर्मों का कमंडल फेक दो
छोड़ दो बातें सभी ये भेद की
द्वेष की चट्टान लावा बन पिघल जाए
प् के नफरत के अगन सारी
दैरो-हरम पर सर झुका दूंगा
हर बंधू को सीने लगा लूँगाe
नीव की तुम एक रख दो ईंट
मैं महल पूरा बना दूंगा
डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, . पर
मोबाइल नो 9839167801

उम्र का सैलाब रोके ना रुका


उम्र का सैलाब रोके ना रुका
केश काले  श्वेत वरनी   हो गए
आधार अवलंबन ही अवलंबित स्वयं
पीत्वरनी एक रोगी की तरह
पड़ी प्रतिपल उँगलियों पे गिनती पल
मोतियों की माल बिखरी, लाल बिखरे
उँगलियों में शेस धागा एक है
संगीत के सुर कम्पनों से बिकम्पित स्वर
अनियंत्रित वाहनों की तरह कापती हाथों की लाठी
जोहता हो बात ऐसे बटोही सी
कुण्डियाँ हैं मौन दर की
अक आलीशान कोठी खंडहर सी
ढूंढती किलकारियां चुपचाप ही
गूँज के फिर गूंजती अनुगूंज
मौन बैठी आस सीने में सजोये
आँधियों से जूझती लौ की तरह
उमड़ती अन्तः में बस एक आह सी
हाय कितना वक़्त निष्ठुर हो गया है

डॉ आशुतोष मिश्र
आचार्य नरेन्द्र देव कॉलेज ऑफ़ फार्मेसी
बभनान, गोंडा, . पर
मोबाइल नो 9839167801